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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

bundeli kahani

बुंदेली कहानी
मस्त रओ मस्ती में
*
मुतके दिना की बात है।  कहूँ दूर-दराज एक गाँव में एक ठो धुनका हतो।
का कई ? धुनका का होत है, नई मालुम?
कैंसें मालूम हुउहै? तुम औरें तो बजार सें बनें-बनायें गद्दा, तकिया ले लेत हो।  
मनो पुराने समै में जे गद्दा-तकिया कारखानों में नें बनत हते।
किसान खेत में कपास के पौधे लगात ते।
बे बड़े होंय तो बिनमें बोंड़ी निकरत हतीं।
फेर बोंड़ी  खिलत तीं तो फूल बनत तीं।
बिनमें सें बगुला के पर घाईं सुफेद-सुफेद कपास झाँकत ती।
तब खेतान की सोभा बहुतई नीकी हो जात ती।
का बताएँ, जैसे आसमान मा तारे बगर जात हैं अमावास की रात में, बिलकुल ऊंसई।
घरवाली मुतियन को हार पैंने हो और हार टूट जाए तो बगरते भए मोती जैसें लगत हैं, ऊंसई।
जा बी कै सकत हों जब घरवाली खुस हो खें खिलखिला देय तो मोतिन कैसें दांत झिलमिलात हैं, ऊंसई।
नें मानो तो कबू कौनऊ समै हमरे लिंगे चलियो जब खेत मा कपास हो।
देख खें खुदई मान जैहो के हम गलत नईं कहत हते।
तो जा कपास खेत सें चुन लई जात ती।
मेहरारू इकट्ठी होखें रुई चुनत जाबें और गीत सोई गात जात तीं।
बे पुरानी धुतिया फाड़ खें एक छोर कान्धा के ऊपर सें और दूसर छोर कान्धा के नीचें से निकार कर गठिया लेत तीं।
ऐंसे में पीठ पे थैलिया घाईं बन जात ती।
बे दोऊ हातन सें रुई चुनत जात तीं और पीठ पे थैलिया में रखत जात तीं।
हरे-हरे खेतन में लाल-पीरी धुतियाँ में मेहरारुओं के संगे सुफेद-सुफेद कपास बहुतई सुहात ती।
बाड़ी में रंग-बिरंगे फूलन घाईं  नीकी-नीकी।
बिन खों हेर खें तबियत सोई खिल जात ती।
तुम पूछत ते धुनका को कहात ते?
जे रुई इकट्ठी कर खें जुलाहे खों दै दई जात ती।
जुलाहा धुनक-धुनक खें रुई से बिनौला निकार देत तो।  
अब तुम औरें पूछिहो जा बिनौला का होत है?
जाई तो मुसकिल है तुम औरों के सँग।
कैत हो अंग्रेजी इस्कूल जात हो।
जातई भरे हो, कें कच्छू लिखत-पढ़त हो।
ऐंसी कैंसी पढ़ाई के तुमें कछू पतई नईया।
चलो, बता देत हैं, बिनौला कैत हैं रुई के बीजा खों।
बिनौला करिया-करिया, गोल-गोल होत है।
बिनौला ढोर-बछेरन खों खबाओ जात है।
गैया-भैंसिया बिनोरा खा खें मुताको दूद देत हैं, सो बी एकदम्म गाढ़ा-गाढ़ा।
हाँ तो का कहत हते?... हाँ याद आ गओ धुनका
रुई सें बिनौला निकार खें धुनका ओ खें धुनक-धुनक खें एक सार करत तो।
फेर दरजी सें पलंगा खे नाप को खोल सिला खें, जमीन पे बिछा देत तो।
जे खोल के ऊपर रुई बिछाई जात ती।    
पीछे सें धीरे-धीरे एक कोंने से खोल पलटा दौ जात तो।
आखर में रुई पूरे खोल कें अंदर बिछ जात ती।
फिर बड़े-बड़े सूजा में मोटा तागा पिरो खें थोड़ी-थोड़ी दूर पै टाँके लगाए जात ते।
टंकाई खें बाद गद्दा भौत गुलगुला हो जात तो।
तुम सहरबारे का जानो ऐंसें गद्दा पे लोट-पॉपोट होबे में कित्तो मजा आउत है?
हाँ तो, हम कैत हते कि गाँव में धुनका रैत तो।
बा धुनका बहुतई ज्यादा मिहनती और खुसमिजाज हतो।
काम सें काम, नईं तो राम-राम।
ना तीन में, ना तेरा में। ना लगाबे में, ना बुझाबे में।
गाँव के लोग बाकी खूब प्रसंसा करत ते।
मनो कछू निठल्ले, मुस्टंडे बासे खूबई खिझात ते।
काय के बिन्खे बऊ - दद्दा धुनिया ना नांव लै-लै के ठुबैना देत ते।
कछू सीखो बा धुनिया सें, कैसो सुबे सें संझा लौ जुतो रैत है अपनें काम में।
जे मुस्टंडे कोसिस कर-कर हार गए मनो धुनिया खों ओ के काम सें नई डिंगा पाए।
आखिर में बे सब धुनिया खों 'चिट्टा कुक्कड़' कह खें चिढ़ान लगे।
का भओ? धुनिया अपने काम में भिड़ो रैत तो।
रुई धुनकत-धुनकत, रुई के रेसे ओके पूरे बदन पे जमत जात ते।
संझा लौ बा धुनिया भूत घाईं चित्तो सुफेद दिखन लगत तो।
रुई निकारत समाई ओखे तांत से मुर्गे की कुकड़ कूँ घाईं आवाज निकारत हती।
कछू दिना तो धुनिया नेब चिढ़ाबेबारों को हडकाबे की कोसिस करी।
मनो बा समज गओ के जे सब ऑखों ध्यान काम सें हटाबें की जुगत है।
सो ओनें इन औरन पे ध्यान देना बंद कर दौ।
ओ हे हमेसा खुस देख कें लोग-बाग़ पूछत हते के बाकी कुसी को राज का आय?
पैले तो बो सुन खें भी अनसुना कर देत तो।
कौनऊ भौत पीछे पारो तो कए तुमई कओ मैं काए काजे दुःख करों?
राम की सौं मो खों कछू कमी नईया।
दो टैम रोटी, पहनबे-रहबे खों कपरा और छत।
करबे को काम और लेबे को को राम नाम।
एक दिना कोऊ परदेसी उतई सें निकरो।
बा कपड़ा-लत्ता सें अमीर दिखत तो मनो खूबी दुखी हतो।
कौनऊ नें  उसें धुनिया के बारे में कै दई।
बा नें आव देखो नें ताव धुनिया कें पास डेरा जमा दओ।
भैया! आज तो अपनी खुसी का राज बाताये का परी।
मरता का न करता? दुनिया कैन लगो एक दिना मोरी तांत का धनुस टूट गओ।
मैं जंगल में एक झाड खों काटन लगो के लडकिया सें तांत बना लैहों।
तबई कछू आवाज सुनाई दई 'मतई काटो'।
इतै-उतै देखो कौनऊ नें हतो।
सोची भरम हो गाओ, फिर कुल्हाड़ी हाथ में लै लई।
जैसेई कुल्हाड़ी चलाई फिर आवाज़ आई।
तब समझ परी के जे तो वृच्छ देवता कछू कै रए हैं।
ध्यान सें सुनी बे कैत ते मोए मत काट, मोए मात काट।
मैंने कई महाराज नै काटों तो घर भर खों पेट कैसें भरहों।
बे बोले मो सें कछू बरदान ले लेओ।
मोए तो कछू ने सूझी के का ले लेऊँ?
तुरतई बता दई के मोहे कछू नें सुझात।
बिननें कई कौनऊ बात नैया, घरबारी सें पूछ आ।
मैं चल परो, रस्ते में एक परोसी मिल गओ।
काए, का हो गओ? ऐंसी हदबद में किते भागो जा रओ।
मो सें झूठ कैत नें बनी सो सच्ची बात बता दई।
बाने मो सें कई जा राज-पाट माँग ले।
मनो घरवारी नें राज-पाट काजे मनाही कर दई।  
बा बोली राज-पाट मिल जैहे तो तैं चला लेहे का?
तोहे तो रुई धुननें के सिवाय कछू काम नई आत।
ऐसो कर दुगानो काम हो खें दुगनो धन आये ऐसो बर माँग।
मोखों घरवारी की बात जाँच गई।
मैंने वृच्छ देवता सें कई तो बिनने मेरे चार हात कर दए।
मैं खुस होखें घर आओ तो बाल-बच्चन नें मोहे भूत समज लओ।
पुरा-परोसी सबी देख खें डरान लगे।
मोहे जो देखे बई किवार लगा ले।
मैं भौतई दुखी हतो, इतै-उतै बागत रओ, मनो कोई नें पानी को नई पूछो।
तब मोखों समज परी के जिनगानी में खुसी सबसे बरी चीज है।
खुसी नें हो तो धन-दौलत को कोनऊ मानें नईयाँ।
बस मैनें तुरतई वृच्छ देवता की सरन लई। १०१
बिनखें हाथ जोरे देवता किरपा करो, चार हात बापस कर लेओ।
मोए कछू ने चाईए, मैं पुराणी तांत के मरम्मत कर लेंहों।
आसिरबाद दो राजी-खुसी से जिनगानी बीत जाए।
वृच्छ देबता ने मोसें दो हात बापस ले लए।
कई जा तोहे कौनऊ चीज की कमी न हुईहै।
कौनऊ सें ईर्ष्या नें करियो, अपनें काम सें काम रखियो।
तबई सें महाराज मैं जित्तो कमात हूँ, उत्तई में खुस रहत हूँ।
कौनऊ सें कबऊ कछू नई मांगू।
कौऊ खें कछू तकलीफ नई देऊँ।
कौनऊ खें ज्यादा मिल जाए तो ऊ तरफी से आँख फेर लेत हूँ।
आप जी चाहो सो समझ लेओ, मैं वृच्छ देवता से मिले मन्त्र को कबऊँ नई भूलो।
आप भी समज लेओ और अपना लेओ 'मस्त रओ मस्ती में '
***


     

shiv tandava stotra hindi kavyanuvad

'शिव-ताण्डव-स्तोत्र' का पद्यानुवाद
स्व. बजरंग लाल जोशी
**
('शिव तांडव स्तोत्र' असत्य के प्रतिनिधि के रूप, हर दशहरे पर जिसके पुतले जलाए जाते हैं, उस रामायण के प्रतिनायक, महान शिवभक्त, लंकापति रावण के व्यक्तित्व का एक दूसरा, अल्पज्ञात किन्तु पांडित्यपूर्ण पक्ष प्रस्तुत करता है । रावण के इस स्तोत्र का कवि ने सन १९४२ में मूल छंद 'पंचचामर' में ही अनुवाद किया था जिससे संस्कृत न जानने वाले भक्त भी इसे समझ सकें और गाकर काव्य और भक्ति का वही आनंद प्राप्त कर सकें जो मूल स्तोत्र को गाने में आता है ।)
जटा विशाल में बहे तरंग गंग की अहा ।
लसै महान शीश पे हिले सुरम्य ज्यों लता ।
प्रशस्त-भाल में जले कराल ज्वाल है सदा ।
उसी मृगांक-मौलि में बढ़े सुभक्ति सर्वदा ॥१॥
विलास हाव-भाव जो करे नगेन्द्र की सुता ।
उसी असीम मोद से तुम्हार चित्त है भरा ।
दयार्द्र-दृष्टि से करे अनेक दूर आपदा ।
उसी दिगम्बरेश में लहें विनोद सर्वदा ॥२॥
जटास्थ सर्प की मणी प्रकाश पीत फेंक के ।
रही लगाय कुंकुमादिशांगना मुखाब्ज में ।
किए गजेन्द्र चरम का सुवस्त्र उत्तरीय वे ।
महान विश्वरक्षक प्रमोद चित्त में भरे ॥३॥
पुरान्दरादि के झुके प्रसून युक्त शीश से ।
गिरी हुई पराग से तुम्हार पाँव हैं सजे ।
बँधी जटा विशाल सर्पराज के शरीर से ।
वही मयंक-मौलि दें अपार सम्पदा हमें ॥४॥
ललाट चक्षु-ज्वाल से किया विदग्ध काम है ।
त्रिदेव में सुश्रेष्ठ विश्वनाथ को प्रणाम है ।
ललाम भाल है सजा निशीथ-नाथ रेख से ।
कपाल-पाणि धूर्जटी अनन्त भूति दें हमें ॥५॥
विशाल भाल चक्षु में जले प्रचंड ज्वाल जो ।
उसी महान आग से किया विदग्ध काम को ।
लिखे विचित्र चित्र जो उमा-कुचाग्र भाग में ।
बढ़े सदा रुची उसी त्रिनेत्र चित्रकार में ॥६॥
घिरी नवीन मेघ से अमावसी विभावरी ।
निशीथ कालिमा वही तुम्हार कंठ में सजी ।
जटा तरंग गंग है, गजेन्द्र चरम अंग है ।
विभूति दें हमें धरें ललाट जो मयंक हैं ॥७॥
खिले हुए सुरम्य नील कंज की सुनीलिमा ।
अहो, विराज कंठ में दिखा रही महाछटा ।
भजो उसी मखारि को, पुरारि को स्मरारि को ।
भवारि अन्तकारि को, गजारि अंधकारि को ॥८॥
अनेक सौख्य से भरे कला-कदम्ब-पुष्प के ।
मधु-प्रवाह पान से प्रमत्त चंचरीक जो ।
हते गजान्धकादि जो, दहे पुरस्मरादि जो ।
हरे विपत्ति, मृत्यु जो भजो उसी मखारि को ॥९॥
जटास्थ सर्प फेंक के विषाक्त ज्वाल व्योम में ।
विशालभाल-ज्वाल की करालता बढ़ा रहे ।
मृदंग की सुताल पे प्रचंड नृत्य जो करे ।
विजै हमें सदा वही महन नृत्यकार दें ॥१०॥
शिला पलंग और मौक्तिकावली भुजंग में ।
सुरत्न-धूलि-खंड और मित्र वा सपत्न में ।
सुलोचना व घास में प्रजा धराधिराज में ।
अभेद मान के कदा भजूँ सुयोगिराज मैं ॥११॥
पवित्र गंग तीर पे बना कुटीर रम्य मैं ।
बसूँ कुबुद्धि छोड़ के, विनम्र हाथ जोड़ के ।
विरक्त होय नारि से निमग्न ध्यान में सदा ।
नमः शिवाय मन्त्र को जपूँ बनूँ सुखी कदा ॥१२॥
निशाचरेंद्र ने रची अतीव उत्तमा स्तुति ।
इसे पढ़े, गुने, कहे पवित्रता लहे अति ।
गुरू महेश में बढ़े सुभक्ति हो न दुर्गति ।
करे प्रसन्न जीव को सुध्यान शम्भु का अति ॥१३॥
लंकेश की रचित जो इस प्रार्थना को ।
पूजा समाप्त करके रति से पढ़े तो ।
लक्ष्मी गजाश्व रथ धान्य धनादि ताँ को ।
देते महेश भज रे 'बजरंग' वाँ को ॥१४॥
वाक्य पुष्प पूजा करी अरपन चरन तुम्हार ।
हो प्रसन्न त्रिपुरारि अब करो इसे स्वीकार ॥१५॥

tripadi-muktak

अभिनव प्रयोग 
त्रिपदियाँ
(सोलह मात्रिक संस्कारी जातीय छंद, पदांत गुरु)
*
तन्मय जिसमें रहें आप वो
मूरत मन-मंदिर में भी हो
तीन तलाक न दे पाएंगे।
*
नहीं एक के अगर हुए तो
दूजी-तीजी के क्या होंगे?
खाली हाथ सदा पाएंगे।
*
बीत गए हैं दिन फतवों के
साथ समय के नहीं चले तो
आप अकेले पड़ जाएंगे।
*
मुक्तक
अर्थ डे है, अर्थ दें तो अर्थ का कुछ अर्थ हो.
जेब खाली ही रहे तो काटना भी व्यर्थ हो
जेब काटे अगर दर्जी तो न मर्जी पूछता
जेबकतरा जेब काटे बिन सजा न अनर्थ हो
*** 

chhand-bahar

छन्द बहर का मूल है ९ 
मुक्तिका:
संजीव
*
पंद्रह वार्णिक, अति शर्करी जातीय सीता छंद.
छब्बीस मात्रिक महाभागवत जातीय गीतिका छंद  
मात्रा क्रम -२१२.२/२१.२२/२.१२२./२१२ 
गण सूत्र-रतमयर 
बहर- फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन 
*
कामना है रौशनी की भीख दें संसार को
मनुजता को जीत का उपहार दें, हर हार को
सर्प बाधा, जिलहरी है परीक्षा सामर्थ्य की
 नर्मदा सा ढार दें शिवलिंग पर जलधार को
कौन चाहे मुश्किलों से हो कभी भी सामना
नाव को दे छोड़ जब हो जूझना मँझधार को
भरोसा किस पर करें जब साथ साया छोड़ दे
नाव से खतरा हुआ है हाय रे पतवार को
आ रहे हैं दिन कहीं अच्छे सुना क्या आपने?
सूर्य ही ठगता रहा जुमले कहा उद्गार को
 २३-०७-२०१५
***

navgeet

एक रचना
फतवा
*
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
ठेकेदार
हमीं मजहब के।
खासमखास
हमई हैं रब के।
जब चाहें
कर लें निकाह फिर
दें तलाक.
क्यों रायशुमारी?
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
सही-गलत क्या
हमें न मतलब।
मनमानी ही
अपना मजहब।
खुद्दारी से
जिए न औरत
हो जूती ही
अपनी चाहत।
ख्वाब न उसके
बनें हकीकत
है तैयारी।
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
हमें नहीं
कानून मानना।
हठधर्मी कर
रार ठानना।
मनगढ़ंत
हम करें व्याख्या
लाइलाज है
अकल अजीरण
की बीमारी।
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*

navgeet

एक रचना
*
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
जनमत के लोथड़े बटोरें
पद के भूखे चंद चटोरे.
दर-दर घूम समर्थन माँगें
ले हाथों में स्वार्थ-कटोरे.
मिलीभगत
फैला अफवाहें
खड़ा करो हऊआ.
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
बाँट रहे अनगिन आश्वासन,
जुमला कहते पाकर शासन.
टैक्स और मँहगाई बढ़ाते
माल उड़ाते, देते भाषण.
त्याग-परिश्रम
हैं  अवमूल्यित
साध्य खेल-चऊआ.
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
निर्धन हैं बेबस अधनंगे
धनी-करें फैशन अधनंगे.
लाज न ढँक पाता है मध्यम
भद्र परेशां, लुच्चे चंगे.
खाली हाथ
सभी को जाना
सुने न क्यों खऊआ?
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*



शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

navgeet

एक रचना
शेष है
*
दुनिया की
उत्तम किताब हम
खुद को पढ़ना
मगर शेष है
*
पोथी पढ़-पढ़  थक हारे हैं
बिना मौत खुद को मारे हैं
ठाकुर हैं पर सत्य न बूझें
पूज रहे ठाकुरद्वारे हैं
विधना की
उत्तम रचना हम
खुद कुछ रचना
मगर शेष है
*
अक्षर होकर क्षर ही जोड़ा
राह बना, अपना पग मोड़ा
तिनका-तिनका चले जोड़ने
जोड़-जोड़कर हर दिल तोडा
छंदों का
उत्तम निभाव हम
खुद का निभना
मगर शेष है
*
डर मत, उछल-कूद मस्ता ले
थक जाए तो रुक सुस्ता ले
क्यों यंत्रों सा जीवन जीता?
चल पंछी बन, कलरव गा ले
कर्मों की
उत्तम कविता हम
खुद को कहना
मगर शेष है
***

bundeli kahani

बुंदेली कहानी
समझदारी
*
आज-काल की नईं, बात भौर दिनन की है।
अपने जा बुंदेलखंड में चन्देलन की तूती बोलत हती।
सकल परजा भाई-चारे कें संगै सुख-चैन सें रैत ती।
सेर और बुकरियाँ एकई घाट पै पानी पियत ते।
राजा की मरजी के बगैर नें तो पत्ता फरकत तो, नें चिरइया पर फड़फड़ाउत ती।
सो ऊ राजा कें एक बिटिया हती।
बिटिया का?, कौनऊ हूर की परी घाईं, भौतऊ खूबसूरत।
बा की खूबसूरती को कह सकत आय? 
जैसे पूरनमासी में चाँद, दीवारी में दिया जोत की सी, जैंसे दूद में झाग।
ऐंसी खिलंदड जैसे नर्मदा और ऊजरी जैंसे गंगा। 
जब कभूं राजकुँवरि दरबार में जात तीं तौ दरबार जगमगान लगत तो। 
राजकुँवरि के रूप और गुनन कें बखान सें सकल परजा को सर उठ जात तो। 
एक सें  बढ़के एक राजा, जागीरदार अउर जमींदार उनसें रिश्ते काजे ललचात रैत ते। 
मनो राजकुँवरि कौनऊ के ढिंगे आँख उठा के भी नें हेरत ती। 
जब कभऊं राजदरबार में कछू बोलत ती तो मनो बीना कें तार झनझना जाउत ते। 
राजा के मूं लगे दरबारन नें एक दिना हिम्मत जुटा कहें राजा साब सें कई। 
"महाराज जू! बिटिया रानी सयानी भई जात हैं।  
उनके ब्याह-काज कें लाने बात करो चाही। 
समय जात देर नईं लगत, बात-चीत भओ चहिए।''
दरबारन की बातें कान में परतई राजकुँवरि के गालन पे टमाटर घाईं लाली छा गई। 
राजकुँवरि के नैन नीचे झुक गए हते। 
राजा साहब ने जा देख कें अनुमान कर लओ कि दरबारी ठीकई कै रए।  
राजकुँवरि ने परदे की ओट सें कई -''दद्दा जू! हुसियार राजा कहें अपनेँ वफादार दरबारन की बात सुनों चाही।'' 
राजा साब नें अचरज के साथ राजकुँवरि की तरफ हेर खें कई ''हम सोई ऐंसई सोचत रए। '' 
''दद्दा जू! मनो ब्याह काजे हमरी एक शर्त है।
हम बा शर्त पूरी करबे बारे सें ब्याह करो चाहत हैं।"
अब तो महाराज जू और दरबारां सबईं खों जैसे साँप सूंघ गओ। 
बेटी जू के मूं सें सरत को नाम सुनतई राजा साब और दरबारी सब भौंचक्के रए गए। 
कोई ने सोची नईं हती के राजकुँवरि ऐसो कछू बोल सकत ती।  
सबरे जाने सोच में पर गए कि राजकुँवरि कछू ऐसो-वैसो नें कै दें। 
कहूँ उनकी कई पूरी नें कर पाए तो का हुईहै?
राजकुँवरि नें सबखों चुप्पी लगाए देख खें आपई कई। 
"आप औरन खों परेसान होबे की कौनऊ जरूरत नईआ।''
अब राजा साब ने बेटी जू सें कई- "बेटी जू! अपुन अपुनी सरत बताओ तें हम सब अपुन की सरत पूरी करबे में कछू कोर-कसार नें उठा रखबी।"
अब बेटी जु ने संकुचाते-संकुचाते अपनी सरत बताबे खातिर हिम्मत जुटाई और बोलीं-
"दद्दा जू! हम ऐसें वर सें ब्याह करो चाहत हैं जो चाहे गरीब हो या अमीर, गोरो होय चाए कारो, पढ़ो-लिखो होय चाए अनपढ़, लंगड़ो होय चाए लूलो पै बो बैठ खें उठ्बो नें जानत होय।"
बेटी जू सें ऐंसी अनोखी सरत सुन खें दरबारन खों दिमाग चकरा गओ। 
आप राजा साब सोई कछू नें समझ पा रए थे। 
मनो राजा साब राजकुँवरि की समझदारी के कायल हते। 
सबई दारबारन खों सोच-बिचार में डूबो देख राजा जू नें तुरतई राज घराने कें पुरोहित खें बुला लाबे काजे एक चिठिया ले कें खबास खें भेज दओ। 
पंडज्जी और खबास खों आओ देख कें महाराज जू नें एक चिट्ठी दे कें आदेस दओ-
"तुम दोउ जनें देस-बिदेस घूम-घूम खें जा मुनादी कराओ और कौनऊ ऐसे खों पता लगैयों जो बैठ खें उठाबो नें  जानत होए।"   
तुमें जिते ऐसो कौनऊ जोग बार मिले जो बैठ खें उठ्बो नेब जानत होय, उतई बेटी जू का ब्याह तय कर अइयो। 
उतई बेटू जु के ब्याओ काजे फलदान को नारियल धर अइयो।  
राजा साब की आज्ञा सुनकें पंडज्जी और खबास दोई जनें देसन-देसन कें राजन लौ गए। 
बे हर जगू  बिन्तवारी करत गए मनो निरासा हाथ लगत गई। 
बे जगूं-जगूं कैत गए "जून राजकुंवर बैठ खें उठ्बो नें जानत होय ओई के संगे अपनी राजकुंवरि का फलदान करबे काजे आये हैं।" 
बे जिते-जिते गए, उतई नाहीं को जवाब मिलत गओ।
कहूँ-कहूँ राजा लोग कयें 'जे कैसी अजब सर्त सुनात हो?
राजकुंवरि खें ब्याओ करने हैं कि नई?
पंडज्जी और खबास घूमत-घूमत थक गए। 
महीनों पे महीने निकारत गए मनो बात नई बनीं। 
सर्त पूरी करबे बारो कौनौ राजकुमार नें मिलो। 
आखिरकार बिननें थक-हार कर बापिस होबे को फैसला करो। 
आखिरी कोसिस करबे बार बे आखिरी रजा के ढींगे गए। 
इतै बी सर्त सुन कें राजदर्बाराब और राजा ने हथियार दार दै। 
दोऊ झनें लौटन लगे तबई राजकुमार बाहर सें दरबार में पधारे। 
उनने पूरी बात जानबे के बाद रजा साब सें अरज करी- 
" महाराज जू! आज लॉन अपने दरबार सें कौनऊ मान्गाबे बारो खली हात नई गओ है।
पुरखों को जस माटी में मिलाए से का फायदा? 
अपने देस जाके और रस्ते में जे दोनों जगू-जगू अपन अपजस कहत जैहें। 
ऐसें बचबे को एकई तरीको है।
आप जू इन औरन की बात रख लेओ।
आपकी अनुमत होय तो मैं इन राजकुमारी की सर्त पूरी करे के बाद ब्याओ कर सकत।"
जा सुन खें महाराज जू और दरबारी पैले तो संकुचाये कि बे ओरन कछू राह नई निकार पाए। 
कम अनुभवी राजकुमार नें रास्ता खोज लओ। 
अपनें राजकुमार की होसियारी पे भरोसा करखें महाराज जू नें कई-
" कुंवर जू! अपनी बात पे भरोसा कर खें हम फलदान रख लेंत हैं, मनो हमाओ सर नें झुकइयो। 
 काये कि सर्त पूरी नें भई तो राजकुमारी मुस्किल में पड़ जैहें। 
राज कुमार ने कई "आप हमाओ भरोसा करकें फलदान ले लेओ मगर हमरी सोई एक सर्त है। 
अब सबरे दरबारी, रजा, पंडज्जी और खबास चकराए। 
अब लौ एकई सर्त पूरीनें हो रई हती, अब एक और सर्त का चक्कर कैसे सुलझेगो?
महाराज नें पूछी तो राजकुमार नें सर्त बताई। 
महाराज आप जेई कागज़ पे एक संदेस लिख कें पठा दें।  
हमाई सरत है कि राजकुमारी की सरत पूरी करबे के काजे हमाओ राजकुमार तैयार है।  
मनो अकेले बे ऊ राजकुमारी सें ब्याओ कर्हें जो परके टरबो नें जानत होय।'
जो राजकुमारी खों जे सर्त स्वीकार होय तो बो अपनी हामी के संगे अपने पिताजू सें फलदान पठा देवें।
राजकुँवर सें  हामी भरवाखें पंडज्जी और खवास दोउ जनों ने जान की खैर मनाई।  
बे दोनों सारदा मैया की जय कर अपने राज खों लौट चले। 
राजा के लिंगा लौट खें पुरोहित नें पूरो हालचाल बताओ। 
पुरोहित नें कई "महाराज! हम दोउ जनें कहूँ रुकें बिना दिन-रात दौरतई रए। 
पैले एक तरफ सें आगे बढ़े हते। 
हौले-हौले देस-बिदेस कें सबई राजा जनों के दरबार में जात गए। 
मनो अकेलीं बेटी जू की सर्त पूरी करे काजे कौनऊ राजकुमार नें हामी नई भरी। 
हर जगूं सुरु-सुरु में भौत उत्साह सें न्योटा लऔ जात। 
मनो सर्त की बात सामने आतेई बिनकों सांप सूंघ जात तो। 
आखर में हम दोऊ निरास हो खें अपने परोसी राजा कने गए। 
बिनने हुलास सें स्वागत-सत्कार करो। 
जैसेई सर्त की बात भई सबकें  मूं उतर गए। 
राजा और दरबारी तो चुप्पै रए गए। 
हम औरन नें सोचीं के खाली हात वापिस होबे के सिवाय कौनौ चारो नईयाँ।
मनो बुजुर्ग ठीकई कै गए हैं मन सोची कबहूँ नई, प्रभु सोची तत्काल। 
हमाई बिदाई होते नें होते राजकुंवर जू दरबार में पधार गए। 
कुँवर जू ने सारी बात ध्यान सें सुनी, कछू देर सोचो और सर्त के लाने हामी भर दई। 
मनों अपनी तरफ सें एक सर्त और धर दई। 
एं कौन सी सर्त? कैसी सर्त? महाराज जू नें हडबडा खें पूछी। 
बतात हैं महाराज! बा सर्त बी बड़ी बिचित्र है।  
कुँवर नें कई के बें ऐसी स्त्री सें ब्याओ करहें जोन पर खें टरबो नईं जानत होय। 
नें मानो तो अपुन जू जा कागज़ खों बांच लेओ। 
जा कागज में सब कछू लिखा दओ है कुँवर नें। 
जा सर्त जान खें महाराज और दरबानी परेसान हते। 
कौनौ खें समझ मीन कौनऊ रास्ता नें सूझो। 
महाराज ने राजकुँवरी खें बुला भेजो। 
बे अपनी सखियाँ खें संगे अमराई में हतीं। 
महाराज जू को संदेसा मिलो तो तुरतई दरबार कें लाने चल परीं। 
राजकुँवरी ने जुहार कर अपनी जगह पे पधार गईं। 
महाराज नें कौनौ भूमिका बनाए बिना पंडज्जी सें कई के बा कागज़ बांच देओ। 
पंडत नें राजा कें हुकुम का पालन कर्खें बा कागज़ झट सें बांच दओ। 
बामें लिखी सर्त सुन खें राजकुँवरी हौले सें मुसक्या दईं और सरम सें सर झुका लओ। 
जा देख खें सबई की जान में जान आई। 
महाराज नें पूछी तो राजकुँवरी नें धीरे सें कै दई के बे जा सर्त पूरी कर सकत हैं।  
फिर का हती, बिटिया रानी की हामी सुनतई पंडत नें तुरतई रजा जी सें कई 'अब बिलम्ब केहि कारज कीजे ?'  
रजा जू पंडत खों मतलब समझ गए और बोले- श्री गनेस जू का ध्यान कर खें मुहूर्त बताओ। 
पंडज्जी तो ए ई औसर की तलास में हते। 
बिनने झट से पोथा-पत्तर निकारो और मुहूरत बता दओ। 
राजा नें महारानी खें बुलाबा भेजो और उन रजामंदी सें संदेश निमंत्रण पत्रिका लिखा दई। 
पत्रिका में लिखो हतो के आप जू अपने राजकुंवर की बारात लें खें अमुक तिथि खों पधारें।  
कवास खें आदेस दओ के जा पत्रिका राजा साब जू खें धिंगे पौन्चाओ। 
खवास तो ऐई मौके की टाक माँ हतो। 
जानत तो दोऊ जगू मोटी बखसीस मिलहै। 
पत्रिका पहुँचतई दोऊ राजन के महलन में ब्याओ की तैयारियां सुरु हो गईं।  
लिपाई-पुताई, चौक पुराई, गाने-बजाने, आबे-जाबे औए मेहमानन के सोर-सराबे से चहल-पहल हो गई।  
दसों दिसा में भोर सें साँझ लौ मंगाल गान गूंजन लगे। 
जैसेंई ब्याओ की तिथि आई बैसेई राजा जू अपने कुँवर साब खों दुल्हा बना खें पूरे फ़ौज-फांटे के संगे चल परे। समधी की राज में बिनकी खूबई आवभगत भई। 
जनवासे में बरात की अगवानी की गई। 
बेंड़नी खों नाच देखबे के खातिर लोग उमड़ परे। 
बरातियों खों पेट भर जलपान और भोजन कराओ गओ। 
जहाँ-तहाँ  सहनाई और ढोल-बतासे बजट हते। 
बरात की अगवानी भई, पलक पांवड़े बिछा दए गए। 
सजी-धजी नारियाँ स्वागत गीत गुंजात तीं। 
नाऊ और खवास बरातियन की मालिस करत हते।  
ज्योनार कें समै कोकिलकंठों से ज्योनार गीत और गारी सुन-सुन खें बराती खूबई मजा लेत ते।     
बरात उठी तो बाकी सोभा कही नें जात ती। 
हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल सब अपनी मस्ती में मस्त हते। 
ढोल, मंजीरा, ताशा, बिगुल, शहनाई के सँग नाच-गाना की धूम हती।  
मंडवा तरे भांवरन की तैयारी होन लगी।
मंडवा तरे राजकुमारी, राजकुमार दूल्हा-दुलहन के काजे रखे पटा पे बिराजे। 
दोउ राजा जू, रानीजू, नजीकी रिस्तेदार दास-दासियाँ, पंडज्जी और खवास सबै आस-पास बैठे हते। 
बन्ना-बन्नी गीत गूंजत हते। 
चारों तरफी हल्ला-गुल्ला, चहल-पहल, उत्साह हतो। 
अब जैसेईं तीं भांवरें पड़ चुकीं, बैसेई कन्या पक्ष को पुरोहित खड़ो हो गओ। 
वर पक्ष के पंडज्जी सें बोलो 'नेंक रुक जाओ पंडज्जी! 
अपुन दोऊ जनन खों मालुम है कै ब्याओ होबे के काजे कछू शर्तें हतीं।
पैले उनका खुलासा हो जावे, तब आगे की भाँवरें पारी जैहें। 
फिर बानें कुँवर जू सें कई "कुँवर जू! पैले अपुन बतावें के बेटी जू नें कौन सी सर्त रखी हती? 
अपुन जा सोई बताएँ के बा सर्त कब-कैंसें पूरी कर सकत?"
जा बात सुनतेई दुल्हा बने राजकुमार झट सें खड़े हो गए। 
बे बोले स्यानन कें बीच में जादा बोलबो ठीक नईयाँ। 
अपनी अकल के माफिक मैं जा समझो के राजकुमारी जी ने सर्त रखी हती के बै ऐसो बर चाउत हैं जो बैठ कें उठबो नें जानत होय। 
जा सर्त में राजकुमारी जू की जा इच्छा छिपी हती के उनको बर जानकार, अकलमंद, कुल-सीलवान, सुन्दर, औए बलसाली भओ चाही।  
ई इच्छा का कारन जे है के कौनऊ सभा में, कौनऊ मुकाबले में ओ खों कौउ हरा नें सकें।   
बिद्वान सें बिद्वान जन हों चाए ताकतवर लोग कौनऊ बाखों हरा खें उठा नें पावे। 
सबै जगा बाकी जीत को डंका पिटो चाही। 
ओके जीतबे से राजकुमारी जू को सर हमेसा ऊँचो रहेगो।
राजकुमारी अपने वर के कारन नीचो नई देखो चाहें। 
बे जब चाहे, जैसे चाहें आजमा सकत आंय। "  
दूल्हा राजा के चुप होतई पंडज्जी ने राजकुमारी से पूछो- 'काय बिटिया जू! तुमाई सर्त जोई हती के कछू और हती?" 
जा सुन कें राजकुमारी नें हामी में सर हिला दओ। 
मंडवा कें नीचे बैठे सबई जनें राजकुमार की अकाल की तारीफ कर कें वाह, वाह कै उठे। 
जा के बाद राजकुमार को पुरोहित खडो हो गओ। 
पुरोहित नें खड़े हो खें कही 'हमाए राजकुमार ने भी एक सर्त रखी हती।  
अब राजकुमारी जू बताबें के बा सर्त का हती और बे कैसे पूरी कर सकत हैं?' 
ई पै राजकुमारी लाज और संकोच सें गड़ सी गईं, मनो धीरे से सिमट-संकुच कें खड़ी भईं। 
कौनऊ और चारा नें रहबे से बिन्ने  जमीन को ताकत भए मंडवा के नीचे बैठे बड़ों-बुजुर्गों से अपने बात रखे के काजे आज्ञा माँगी। 
आज्ञा मिलबे पर धीमी लेकिन साफ़ आवाज़ में  कई 'राजकुँवर की सर्त जा हती के बें ऐसी स्त्री सें ब्याओ करो चाहत हैं जौन पर खें टरबो नईं जानत होय।'
हम  सर्त से जा समझें के राजकुमार नम्र और चतुर पत्नी चाहत हैं। 
ऐंसी पत्नी जो घरब के सब काम-काज जानत होय। 
ऐंसी पत्नी जो कामचोर और आलसी नें होय।
जो घर के सब बड़ों को अपने रूप, गुण, सील और काम-काज सें प्रसन्न रख सके। 
ऐसो नें होय के जब दोउ जनें परबे खों जांय तो कछू छूटो काम याद आने से उठनें परे। 
ऐसो भी ने होय कि बड़ो-बूढ़ों परबे या उठबे के बाद कौनौ बात की सिकायत करे और घर में कलह हो।  
राजकुमार ऐंसी सुघड़ घरबारी चाहत हैं जो कमरा में आ कें परे तो कौनऊ कारन सें उठबो नें जानें।  
राजकुमार जब - जैसे चाहें परीक्छा ले लें। 
दुल्हन के चुप होतई पुरोहित ने राजकुमार से पूछो- 'काय कुँवर जू! तुमाई सर्त जोई हती के कछू और हती?" 
जा सुन कें राजकुमार नें अपनी रजामंदी जता दई। 
मंडवा कें नीचे बैठे सबई लोग-लुगाई और सगे-संबंधी ताली बजाओं लगै। 
राजकुंवरी और राजकुमार की समझदारी नें सबई खों मन मोह लओ हतो।  
पंडज्जी और पुरोहित नें दोऊ पक्षों के सर्त पूरी होबे की मुनादी कर दई। 
राजकुँवर मंद-मंद मुसक्या रए हते। 
राजकुमारी अपने गोर नाज़ुक पैर के अंगूठे सें गोबर लिपा अँगना कुरेदत हतीं।  
उनकें गोरे गालन पे लाली सोभायमान हती। 
पंडज्जी और पुरोहित जी ने अगली भांवर परानी सुरु कर दई।  
सब जनें भौत खुस भये कि दुल्हा-दुल्हन एक-दूसरे के मनमाफिक आंय।  
सबसे ज्यादा खुसी जे बात की हती के दोऊ के मन में धन-संपत्ति और दहेज को लोभ ना हतो।  
दोऊ जनें गुन और सील को अधिक महत्व देखें संतोस और एक-दूसरे की पसंद को ख्याल रख कें जीवन गुजारन चाहत ते। 
सब जनों ने भांवर पूरी होबे पर दूल्हा-दुल्हिन और उनके बऊ-दद्दा खों खूब मुबारकबाद दई। 
इस ब्याव के पैले सबई जन घबरात हते कि "बैठ कें उठबो नें जानन बारो" वर और "पर खें टरबो नईं जानन बारी बहू" कहाँ सें आहें?
असल में कौनऊ इन शर्तों का मतलबई नें समझ पाओ हतो। 
आखिर में जब सब राज खुल गओ तो सबनें चैन की सांस लई।  
इनसे समझदार मोंड़ा-मोंडी हर घर में होंय जो धन की जगू गुन खों चाहें। 
तबई देस और समाज को उद्धार हुइहै।
राजकुमारी और राजकुमार को भए सदियाँ गुजर गईं मनों आज तक होत हैं चर्चे उनकी समझदारी के।  
***

chhand-bahar

ॐ 
छंद बहर का मूल है: ८ 
*
छंद परिचय:
संरचना: SIS SIS SIS S / SIS SIS SISS 
सूत्र: रररग।
दस वार्णिक पंक्ति जातीय बाला छंद।
सत्रह मात्रिक महासंस्कारी जातीय रामवत छंद।
बहर: फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़े / 
फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़ाइलातुं ।
*
आप हैं जो, वही तो नहीं हैं
दीखते है वही जो नहीं हैं 

*
खोजते हैं खुदी को जहाँ पे
जानते हैं वहाँ तो नहीं हैं
 *
जो न बोला वही बोलते हैं 

बोलते, बोलते जो नहीं हैं
*
माल को तौलते ही रहे जो
आत्म को तौलते वो नहीं  

*
देश शेष क्या? पूछते हैं
देश में शेष क्या जो नहीं हैं
*

आद्म्मी देवता क्या बनेगा?
आदमी आदमी ही नहीं है 
*
जोश में होश को खो न देना 
देश में जोश हो, क्यों नहीं है?
***
SIS SIS SISS

आपका नूर है आसमानी
गायकी आपकी शादमानी  

*
आपका ही रहा बोलबाला
लोच है, सोज़ है रातरानी
 *
आसमां छू रहीं भावनाएँ
भ्रांत हों ही नहीं वासनाएँ
 *
खूब हालात ने आजमाया
आज हालात को आजमाएँ
*
कोशिशों को मिली कामयाबी
कोशिशें ही सदा काम आ
एँ
*
आदमी के नहीं पास आएँ
हैं विषैले न वे काट खाएँ  
***
२१.४.२०१७
***

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

bundeli kahani

बुंदेली कहानी 
छिमा बड़न खों चाहिए
*
जा कहानी भौत समै पैले की बात आय 
एक राज को राजा भौतै नोनों हतो, दयावान गुनी न्यायप्रिय। 
रैयत सोई ऊखों खूब चाहतती काये कें ऊ सबको भलो करत हतो। 
सारे राज में सब तरफ अमन-चैन हतो। 
लोग-लुगाइयां, लड़के-बारे सबई राजी-खुसी हते
एक बात तनक गड़्बड़ हती के ऊ राजा के कान भौत बड़े बड़े हते। 
राजा जब दरपन में झाँकत हतो तो लम्बे-लम्बे कान देख कें भौतई झेंपत तो.
राजा कौनऊ खें जा बात बताबें सें बचत तो। 
कौनौ खें पता नें चल जाए जा काजे बो अपने कान बड़ी भारी पगड़ी में लुकायें रेत तो। 
जा राज की बात रानी तक ने जान पाईं हतीं
हाँ, राजा को जोन नाऊ हतो ऊ भर जानत तो 
नाऊ तो राजा के बार बनाउत तो, सो ऊसें जा बात राजा छिपा सोई ने सकत तो। 
पे भईया राजा ने ऊखों शुद्ध बुंदेली में समझा दओ के जा बात कोऊखों पता ने लगे 
और कौनौ खें पाता लगी तो तुमें तुरतई फाँसी पे लटका दओ जैहे। 
कच्छू हो जाए नाऊ कायेखों कोऊ से कतो? 
नाऊ खें फाँसी पी थोड़ी चड़ने हती। 
हर मईना पंदरा दिन मा ऊ बखरी में आउत तो 
नाऊ आत तो और चुप्पै चाप रजा खें बार बनाके चलो जात तो। 
ऐंसई धीरे-धीरे समय बीतत जात तो
कोऊ खों पता ने हती के ऊ राजा के कान खूब बड़े हैं। 
सब कछू मजा में चलत जा रओ तो। 
कहत हैं सब दिन जात नें एक समान
भैया! होनी खों को कौन टार सकत?
सयाने जहाँ कैत हैं होनी तो होकर रए, अनहोई नैं होय 
समय का फेर एक बेर नाऊ बीमार हो गओ
और ऐसो बीमार भओ के दो मईना बिस्तरई सें ने ऊठो।
कछू दिना तेन कछू फरक नें पड़ो
मनो धीर-धीरे राजा भौतई परेसान भओ 
भई जा के बाके बार भौतई बड़े- बड़े हो गए
बार इत्ते बड़े हो गये के ऊखों अकबकाई लगन लगी
राजा कछुक दिना तो काम चलात रओ  
मनो धीरे-धीरे मूड़ बसान लगो।
बॉस के मारे रानी सोई पास आबे से बचन लगी
राज कए तो का कए, और कैसें कए?
एक दिन रानी नें बा सें कई 'राजा जू! बाल काए बढ़ा रए हो?'
राजा नें हंसी-मजाक में बात उड़ा दई।
कछू दिना बाद रानी नें फिर कई " का हमाई जमात में मिलबे की तैयारी है?"
राजा नें सुन कें अनसुनी कर दई।
अब तो रानी सोई परेसान के का भओ जो राजा बात पे कान नई दे रए?
एक दिना रानी नें धमकी दे दई के बाल नें कटहें तो संगे नई अइयो।
अब तो भरी मुस्किल भई, मरता क्या न करता?
आखिरकार राजा नें दूसरे नाई खों खबर भिजा दई।
राज महल के चौकीदार ने जाखें बताओ कि राजनाऊ बीमार है।
एई सें सकारे-सकारे राजमहल में आकें राजा कें बारा बना जाओ।
ई नये नाऊ को नाम गोपाल हतो।
मनो बचपन से सब गुपाला, गुपाला कहत ते।
बा गौओं के पीछे-पीछे उपला बटोरत हतो।
'गुपला आओ, उपला लाओ' कई-कई खें सब ऑखों चिढ़ात हते।
जिन्दगी में पैली बार कौनऊ से 'गोपाल' सुनखें बा मनई मन में मुस्काओ।
चौकीदार नें राजा साब का संदेस बता दओ।
गुपला ने राजा को बुलौआ सुनो सो खूब खुस हो गओ।
अपनी पेटी उस्तरा लेकें, राज महल में पोंच गओ।
राजा नें गुपला खें अपने गुसलखाने में बुला लओ।
उतै राज और अकेले हते।
राजा नें गुपला से वचन ले लओ के महल की बात कौनऊ सें नई कइयो।
गुपला नें तुरतई हामी भर दई।
अब राजा नें बार बनवाबे के लाने अपनी पगड़ी उतारी।
राजा कें कान देखकें गुपले डरा गओ।
"हे भगवान! इत्ते बड़े कान? हाथी के कानों घाईं।"
राजा नें गुपला खें घूर खें देखा।
डर के मारे गुपला की घिघ्घी बंध गई।
राजा ने ऊसें कई "देखो गुपला! हमाये कान भोतई बड़े हैं।
मनो जा बात आज लौं कोऊखों नईं पता।
तुम सोई जा बात कोऊसें ने कईओ।
तुमने कोऊ सें कई तो हमें कैसऊँ न कैसऊँ पता लग जैहे।
और फिर हम तुमें चोरी के इल्जाम में फाँसी पे टाँग देहें।"
गुपला नें कई के बाने कहूँ चोरी नई करी।
राजा बोलो राज खोलबे के काजे झूठो इल्जाम बना दओ जैहे।
गुपला खें डर कें मारे पसीनो निकरन लगो।  
राज ने ढाढस बँधाओ खें कहो नें डरो।
मनो महल की कौनऊ बात कहूँ नें कहियो।
गुपला हाथ जोड़ खें बोलो "हुज़ूर हम कौनऊं से नें केहें?
महल की बात कै के हमें मरने है का?"
गुपला ने डरात-डरात जैसें-तैसें राजा खें बार बनाये।
कौनउ बख्शीश दै पातो बाके पैलेई गुपला पेटी लेकें भगो।
गुपाला नें पिछारूं मुरक कें लो नईं देखो।
गुपाला खें भगत देख कौनऊ नें पूछो 'काये पीछे भूत लगे हैं का?
ऐंसे भग रओ है मनो जान हथेली में धरि आय।"
घरे पोंच कें गुपला की साँस में साँस आई।  
अब रात-दिन गुपला खों एकई चिंता हती।
का करे जासे कौनौ खें ई बात को पता नें चले के राजा के कान बड़े-बड़े हैं।
कहूँ कौनऊ खें पता चलो तो राजा तो जोई समझहे के गुपला नेई बताओ हुईए।
गुपला को चित्त कौनऊ काम में ना लगत तो।
घरबारी समझ गई की इनै कोऊ बात खाए जा रई है।
बाने पूछो भी, मनो पूछन पर गुपला मुकर गओ।
बाने कै दई कौनऊ बात नईयाँ।
घरबारी खों बेफिकर करबे खों गुपला ने मन मार खें ब्यारी खा लई।
रोटी खा पीकें गुपला आराम करन लगो।
पे परें परें ऊको एकदम सें पेट पिरान लगो।
गुपाला सोचन लगो 'जो का भओ...? पेट काय पिरा रओ?'
ऊखों तबई खबर आई के ऊखों जा बड़ी खराब बीमारी है।
बीमारी जे के कौनौउं गुप्त बात ऊके पेट पचत नईंयां।
ए दैया अब का करे?, राजा के कानों बारी बात कोऊ सें के भी नईं सकत।
केत हैं तो राजा फाँसी पे टंगवा देहे और ने केहें तो पेट में दर्द सें ऊंसई मर जेहें।
का करे? सोच-सोच खें ऊ तो पगला गओ।
जैसें-तैसें रात भई, ऊने सोबे की कोसिस करी।
पे नींद तो ऐंसी गायब भई जैसें गधा खें मूँद सें सींग।
पेट इत्ती जोर सें पिरानो, के लगो के अब प्रान निकरतई हैं।
सोचते-सोचते ऊखों एक उपाय सूझो।
ऊ दौड़ लगा खें घर के बायरे लगे एक पेड़ की लिंगां पोंचो।
ऊनें झाड़ के तना सें मूं लगा खें ऊ के कान में धीरे सें के दई राजा के कान बड़े-बड़े हैं।
चुगली कर दई, सो पेट में बात न पचने के दर्द सें छुटकारा मिल गओ।
गुपला को पेट पिराबो मिट गओ।
ऊने सोची के पेड़ कौन बोलत आहे सो कौन से केहे?
सांप भी मर गओ और लाठी सोई नईं टूटी।
सो गुपाला घरे जाकें मजे सें सो गओ।
पे भगवान की मर्जी कछु और हती।
निज सोची कब्ब्हू नईं, प्रभु सोची तत्काल।
कछू दिना बाद ऊ पेड़ काट डारो गओ।
ऊ पेड़ की लकड़ियन सें तबला और सारंगी बना दए गए।
बा समय नियम हतो के कौनऊ नओ साज बनाओ जाए तो पैली मरतबा राज-दरबार में बजाओ।
जैसो नियम हतो दोई बाजे पैली बेर राजा के दरबार मॆं बजबे गये।
दरबार खचाखच भरो हतो काये सें के नये बाजन खों सबई जने मजा लिओ चाहत ते।
जैसेईं तबलची ने तबला पे हाथ ठोको सो आवाज आई "राजा के बड़े बड़े कान, राजा के बड़े बड़े कान।"
सारंगीबाज नें सारंगी के तार छेड़े तो आवाज आई "तोसें किन्ने कई? तोसें किन्ने कई?" अब तबला बोला "गुपले नाई ने कई, गुपले नाई ने कई"।
सारे दरबार में एकदम से सन्नाटा छा गया।
दरबारियों खें काटो तो खून नई।
भई गति सांप-छछूंदर केरी, उगारत-निगारत पीर घनेरी।
दरबारन सें नें तो बैठत बन रओ हती, नें बागत बन रओ हतो।
'जे का हो रओ है?' दरबारी कानाफूसी करन लगे।
तबला - सारंगी बेर-बेर एकई बात कहत ते।
कौनऊ काछो नें बोलो पे सबई समझ गए के बात का है।
राजा की बड़ी पगड़ी को राज खुल गओ हतो।
अपनी पोल खुलबे सें राजा गुस्से से पागल हो गओ।
बा ने हुकुम करो "पकड़ खें लाओ गुपले नाई को।"
बात फैलन में देर नांय लगती।
गुपला नें सुनीं सो समझ गइ अब खैर नई आ।
बाने घर छोड़ खें भगबे की तैयारी कर लई।
गुपाला की घरवारी चुप्पैचाप सब देख रई।
बाखों भी समझ पर गई कि कछू गडबड हुई है।
गुपला तो कछू खत नै हतो।
नाउन नें इतै-उतै से सब बात जान लई।
बा रोज महल में रानी साहिबा खों तेल मलत हती।
एक कहाउत है 'मरता का न करता?'
सो नाउन डरते-डरते महल खों भागी के रानी साहिबा से बिनती कर खें गुपला की जान बचाए।
गुपला खों भगबे के पैलेई सिपाहियन नें पकड़ लओ।
गुपला डरात-डरात आओ और राजा के पैरों पे गिर परो"
राजा के पैर पकर लए और बिनती करन लगो "हुज़ूर! गलती माफ हो।
अन्नदाता! मैंने ऐसो जानबूझ कें नईं करो!
मोखों जा बीमारी है के कौनउं बात पचत नई याँ।
ए के बाद भी मैंने कौनऊ मनई सें नई कई।
आपकी सौं घरवारी पूछत-पूछत हैरान हती मनें मैंने काछो नई कई।
हुज़ूर तो मोरो पेट पिरात रओ सो मैंने एक पेड़ के कान में जा बात कै दई ती के जा तो बोल नई सकत है।
माई-बाप हमें का पता ती के पेड़ की लकडिया सें तबला-सारंगी बनहै और बेई बोल दैहें।"
राजा साब पैले तो खूब लाल-पीले भए।
दरबारन ने बिनय करी 'महाराज! आप तो सबई के माई-बाप हो।
औलाद गलती करें तो कौनऊ माँ-बाप प्रान थोरेई ले लेत हैं।
महाराज नें सोच-बिचार में परे हते।
उतै नाउन नें महारानी के चरन पाकर लै।
सारी बात सांच-सांच कै दई।
काह न अबला कर सके?
दोऊ नें एक-दूसरी की बात 'कम कए सें ज्यादा समझियो' की  बिना पे समझ लई।
महारानी ने तुरत फैसला लओ और खास दासी को चिठिया पे कुछ लिख खें महाराज कें ढींगे भेज दओ।
दासी नें तुरतई महल से दौर लगाई और दरबार में पोंच खें बा चिठिया महाराज खों दई।
बा चिठिया में महारानी नें लिखो हतो 'अब तो सबखों सच पता हो गओ है।
अब लौ छिपाओ सो छिपाओ, अब छिपाबै खों कछू नईया।
गुपला खो मार खें अपजस नें लें महाराज।
बाकी जान बखस दैहें तो सगरी प्रजा जै-जै कार करहे।
हम सोई हमसें बात छिपाबै के लाने हुजूर से नाराज हैं।
मनो गुपला को माफी मिलबे की खुसी में सब भूल जैहें।"
राजा सोई सारे मामले को लै कें भारी परेसान हते।
रानी के संदेसे सें उनें एक रास्ता मिल गओ।
बिन नें गुपले खों माफ करबे की मुनादी करा दई।
गुपला नें महाराज के पैस पकड़ लए।
सारे दरबारी जै-जै कार करन लगे।
उतै महल में महारानी के चरण चापती नाउन नें अपनो सुहाग बचाबे खातिर आंसुआ भरी आँखों सें महारानी के प्रति आभार जता दओ।

कथा सें सार जो निकारो के
१. सच खों कितनऊ छिपाओ जाए बा कौनऊ नें कौनऊ तरीके सें सामने आ जात है।
२. सच सें दरबे की जगह सच का सामना करो चाही।
३. अपनों राज दूसरे कें कान में पदों तो राज नई रह जात।
४. छिमा बड़न खों चाहिए, छोटन खों अपराध।
***
१७१ वाक्य

chhand-bahar 7

​ॐ 
छंद बहर का मूल है: ७ 
 *
छंद परिचय:
संरचना: SIS SIS IS / SISS ISIS
सूत्र: ररलग।
आठ वार्णिक अनुष्टुप जातीय              छंद।
तेरह मात्रिक भागवत जातीय उल्लाला छंद।
बहर: फ़ाइलुं 
फ़ाइलुं फ़अल / फ़ाइलातुं मुफ़ाइलुं ।
*
देवता है वही सही
जो चढ़ा वो मँगे नहीं
*
बाल सारे सफेद हैं
धूप में ये रँगे नहीं
*
लोग ईसा बनें यहाँ
सूलियों पे टँगे नहीं
*
दर्द नेता न भोगता
सत्य है ये सभी कहीं
*
आम लोगों न हारना
हिम्मतें ही जयी रहीं
 *
SISS ISIS
जी न चाहे वहीं चलो    
धार ही में बहे चलो   
*
दूसरों की न बात हो 
हाथ खाली मले चलो   
*
छोड़ भी दो तनातनी 
ख्वाब हो तो पले चलो  
*
दुश्मनों की निगाह में  
शूल जैसे चुभे चलो 
*
व्यर्थ सीना न तान लो 
फूल पाओ झुके चलो 
 *
 ***
१९.४.२०१७
***

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

ग़ज़ल

एक बुंदेली लोक कथा 
बैठे तो उठै नईं, परै तो टरै नईं 
१०१. भौत दिना भए, अपने जा बुन्देलखण्ड मा चन्देलन की तूती बोलत हती।  
१०२. चन्देलन के राज में परजा सुख-चैन की बाँसुरी बजात रही। 
१०३. सुनों है के सेर और बकरिया एकई घाट पै पानी पियर रए।
१०४. राजा की मरजी कें बिना न चिरीया चीकत थी, ना बाज पर फरफरात तो।
१०५. सो ऊ राजा के एक बिटिया हती। 
१०६. भौतऊ खूबसूरत, मनो पूनम कैसो चन्दा।
१०७.    

एक रचना
*
वतन परस्तों से शिकवा किसी को थोड़ी है
गैर मुल्कों की हिमायत ही लत निगोड़ी है
*
भाईचारे के बीच मजहबी दखल क्यों हो?
मनमुटावों का हल, नाहक तलाक थोड़ी है
*
साथ दहशत का न दोगे, अमन बचाओगे
आज तक पाली है, उम्मीद नहीं छोड़ी है
*
गैर मुल्कों की वफादारी निभानेवालों
तुम्हारे बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है
*
है दुश्मनों से तुम्हें आज भी जो हमदर्दी
तो ये भी जान लो, तुमने ही आस तोड़ी है
*
खुदा न माफ़ करेगा, मिलेगी दोजख ही
वतनपरस्ती अगर शेष नहीं थोड़ी है
*
जो है गैरों का सगा उसकी वफा बेमानी
हाथ के पत्थरों में आसमान थोड़ी है
*




मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

chhand-bahar


ॐ 
छंद बहर का मूल है: ६  
*
छंद परिचय:
संरचना: SIS ISI S
SI SIS IS 
सूत्र: रजतरलग।
चौदह वार्णिक शर्करी जातीय            छंद।
बाईस मात्रिक महारौद्र जातीय          छंद।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं।
*
देश-गीत गाइए, भेद भूल जाइए
सभ्यता महान है, एक्य-भाव लाइए 
*
कौन था कहाँ रहा?, कौन है कहाँ बसा?
सम्प्रदाय-लिंग क्या?, भूल साथ आइए
 *
प्यार-प्रेम से रहें, स्नेह-भाव ही गहें 
भारती समृद्ध हो, नर्मदा नहाइए
 *
दीन-हीन कौन है?, कार्य छोड़ मौन जो
देह देश में बनी, देश में मिलाइए
 *
वासना न साध्य है, कामना न लक्ष्य है 
भोग-रोग-मुक्त हो, त्याग-राग गाइए
*
ज्ञान-कर्म इन्द्रियाँ, पाँच तत्व देह है  
गह आत्म-आप का, आप में खपाइए 
*
भारतीय-भारती की उतार आरती
भव्य भाव भव्यता, भूमि पे उतरिये
***
१८.४.२०१७ 
*** 

प्रश्न-उत्तर


रोचक चर्चा:
गुड्डो दादी 
ताल मिले नदी के जल से 
नदी और सागर का मेल ताल क्यों ?
*
सलिल-वृष्टि हो ताल में, भरे बहे जब आप
नदी ग्रहण कर समुद तक, पहुँचे हो थिर-व्याप
लघु समुद्र तालाब है, महाताल है सिंधु
बिंदु कहें तालाब को, सागर को कह इंदु
***

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

chhand-bahar

ॐ 
छंद बहर का मूल है: ५  
चामर छंद
*
छंद परिचय:
पन्द्रह वार्णिक अतिशर्करी जातीय चामर छंद।
तेईस मात्रिक रौद्राक जातीय     छंद
 
संरचना: SIS ISI SIS ISI SIS
सूत्र: रजरजर।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं।
*
देश का सवाल है न राजनीति खेलिए
लोक को रहे न शोक लोकनीति कीजिए
*
भेद-भाव भूल स्नेह-प्रीत खूब बाँटिए 

नेह नर्मदा नहा , रीति-प्रीति भूलिए
*
नीर के बिना न जिंदगी बिता सको कभी
साफ़ हों नदी-कुएँ सभी प्रयास कीजिए
*
घूस का न कायदा, न फायदा उठाइये  

काम-काज जो करें, न वक्त आप चूकिए
*
ज्यादती न कीजिए, न ज्यादती सहें कभी
कामयाब हों, प्रयास बार-बार कीजिए
*
पीढ़ियाँ न एक एक सी रहीं न हो सकें कभी 

हाथ थाम लें, गले लगा न आप जूझिए
*
घालमेल छोड़, ताल-मेल से रहें सुखी
सौख्य पालिए, न राग-द्वेष आप घोलिए
*
१७.४.२०१७
***

रविवार, 16 अप्रैल 2017

bhakti geet

एक रचना
रेवा मैया
*
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
जग-जीवन की नाव खिवैया
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
भाव सागर से पार लगैया
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
रोग-शोक भव-बाधा टारें
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
सब जनगण मिल जय उच्चारें
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
अमृत जल है जीवनदाता
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
पुण्य अनंत भक्त पा जाता
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
ब्रम्हा-शिव-हरि तव गुण गायें
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
संत असुर सुर नर तर जाएँ
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
विन्ध्य, सतपुड़ा, मेकल हर्षित
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
निंगादेव हुए जन पूजित
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
नरसिंह कनककशिपु संहारे
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
परशुराम ने क्षत्रिय मारे
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
राम-सिया तव तीरे आये
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
हनुमत-जामवंत मिल पाए
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
बाणासुर ने रावण पकड़ा
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
काराग्रह में जमकर जकड़ा
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
पांडवगण वनवास बिताएँ
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
गुप्तेश्वर के यश जन गायें
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
गौरी घाट तीर्थ अतिसुन्दर
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
घाट लम्हेटा परम मनोहर
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
तिलवारा बैठे तिल ईश्वर
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
गौरी-गौरा भेड़े तप कर
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
धुआंधार में कूद लगाई
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
चौंसठ योगिनी नाचें माई
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
संगमरमरी छटा सुहाई
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
नौकायन सुख-शांति प्रदाई
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
बंदर कूदनी कूदे हनुमत
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
महर्षि-ओशो पूजें विद्वत
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
कलकल लहर निनाद मनोहर
             रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
हो संजीव हरो विपदा हर
            रेवा मैया! रेवा मैया!!
***

bhakti geet

भक्ति गीत :
कहाँ गया
*
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
कण-कण में तू रम रहा
घट-घट तेरा वास.
लेकिन अधरों पर नहीं
अब आता है हास.
लगे जेठ सम तप रहा
अब पावस-मधुमास
क्यों न गूंजती बाँसुरी
पूछ रहे खद्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
श्वास-श्वास पर लिख लिया
जब से तेरा नाम.
आस-आस में तू बसा
तू ही काम-अकाम.
मन-मुरली, तन जमुन-जल
व्यथित विधाता वाम
बिसराया है बोल क्यों?
मिला ज्योत से ज्योत  
कहाँ गया रणछोड़ रे!,
जला प्रेम की ज्योत
*
पल-पल हेरा है तुझे
पाया अपने पास.
दिखता-छिप जाता तुरत
ओ छलिया! दे त्रास.
ले-ले अपनीं शरण में
'सलिल' तिहारा दास
दूर न रहने दे तनिक
हम दोनों सहगोत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
***

doha

दोहा दुनिया 

नित्य निनादित नर्मदा, कलकल सलिल प्रवाह
ताप किनारे ही रुका, लहर मिटाती दाह
*
परकम्मा करते चरण, वरते पुण्य असीम
छेंक धूप को छाँह दें, पीपल, बरगद, नीम
*
मन कठोर चट्टान सा, तप पा-देता कष्ट
जल संतों सा तप करे, हरता द्वेष-अनिष्ट
*
मग पर पग पनही बिना, नहीं उचित इस काल
बाल न बाँका लू करे, पनहा पी हर हाल
*
गाँठ प्याज की संग रख, लू से करे बचाव
मट्ठा पी ठट्ठा करो, व्यर्थ न खाओ ताव
*
भर गिलास लस्सी पियो, नित्य मलाईदार
कहो 'नर्मदे हर' सलिल, खा ककड़ी हर बार
*
पीस पोदीना पत्तियाँ, मिर्ची-कैरी-प्याज
काला नमक व गुड़ मिला, जमकर खा तज लाज
*
मीठी या नमकीन हो, रुचे महेरी खूब
सत्तू पी ले घोलकर, जा ठंडक में डूब
*
खरबूजे-तरबूज से, मिले तरावट खूब
लीची खा संजीव नित, मस्ती में जा डूब
*
गन्ना-रस ग्लूकोज़ का, करता दूर अभाव
गुड़-पानी अमृत सदृश, पार लगाता नाव
*

chhand-bahar

ॐ 
छंद बहर का मूल है: ४ 
कुंडल छंद
*
छंद परिचय:
बाईस मात्रिक महारौद्र जातीय कुंडल छंद 

चौदह वार्णिक शर्करी जातीय छंद।
संरचना: SIS ISI SIS ISI SS
सूत्र: रजरजगग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं फ़ऊलुं।
*
प्रात, शाम, रात रोज आप ही सुहाए 

मौन हेरता रहा न आज आप आए 
*
छंद-गीत, राग-रीत कौन सीखता है?
शारदा कृपा करें तभी न सीख पाए 
*
है कहाँ छिपा हुआ, न चाँद दीखता है 
दीप बाल-बाल रात ही न हार जाए 
*
दूर बैठ ताकती , न भू भुला सकी है 
सूर्य रश्मि-रूप धार श्वास में समाए 
*
आसमान छेदता, दिशा-हवा न रोके 
कामदेव चित्त को अशांत क्यों बनाये?
*
प्रेमिका न ज्ञान-दान प्रेम चाहती है 
रुठती न, रूठना दिखा-दिखा खिझाए 
*
हारता न, हार-हार प्रेम जीतता है 
जीतता न जीत-जीत, प्रेम ही हराए 
*
१६.४.२०१७
***