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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

कार्यशाला
छंद बहर दोउ एक है - ९
रगण यगण गुरु = २१२ १२२ २
सात वार्णिक उष्णिक जातीय, बारह मात्रिक आदित्य जातीय छंद
बहर- फाइलुं मुफाईलुं
*
मुक्तक
मेघ ने लुभाया है
मोर नाच-गाया है
जो सगा नहीं भाया
वह गया भुलाया है
*
मौन मौन होता है
शोर शोर बोटा है
साफ़-साफ़ बोले जो
जार-जार रोता है
*
राजनीति धंधा है
शीशहीन कंधा है
न्याय कौन कैसे दे?
क्यों प्रतीक अँधा है
*
सूर्य के उजाले हैं
सेठ के शिवाले हैं
काव्य के सभी प्रेमी
आदमी निराले हैं
*
आपने बिसरा है
या किया इशारा है?
होंठ तो नहीं बोला
नैन ने पुकारा है
*
कौन-कौन आएगा?
देश-राग गायेगा
शीश जो कटाएगा
कीर्ति खूब पायेगा
*
नवगीत
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
वायवी हुए रिश्ते
कागज़ी हुए नाते
गैर बैर पाले जो
वो रहे सदा भाते
संसदीय तूफां की
है नहीं रही रेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
लोकतंत्र पूछेगा
तंत्र क्यों दरिंदा है?
जिंदगी रही जीती
क्यों मरी न जिंदा है?
आनुशासिकी कीला
क्यों यहाँ नहीं मेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
क्यारियाँ कभी सींचें
बागबान ही भूले
फूल को किया रुस्वा
शूल को मिले झूले
मौसमी किए वादे
फायदा नहीं सदा पेखा
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
***
मेखा = ठोंका, पेखा = देखा

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

mukatak

मुक्तक 
माँ 
माँ की महिमा जग से न्यारी, ममता की फुलवारी 
संतति-रक्षा हेतु बने पल भर में ही दोधारी 
माता से नाता अक्षय जो पाले सुत बडभागी-
ईश्वर ने अवतारित हो माँ की आरती उतारी 
नारी 
नर से दो-दो मात्रा भारी, हुई हमेशा नारी 
अबला कभी न इसे समझना, नारी नहीं बिचारी
माँ, बहिना, भाभी, सजनी, सासु, साली, सरहज भी 
सखी न हो तो समझ जिंदगी तेरी सूखी क्यारी 
*
पत्नि 
पति की किस्मत लिखनेवाली पत्नि नहीं है हीन 
भिक्षुक हो बारात लिए दर गए आप हो दीन 
करी कृपा आ गयी अकेली हुई स्वामिनी आज 
कद्र न की तो किस्मत लेगी तुझसे सब सुख छीन 
*
दीप प्रज्वलन 
शुभ कार्यों के पहले घर का अँगना लेना लीप  
चौक पूर, हो विनत जलाना, नन्हा माटी-दीप   
तम निशिचर का अंत करेगा अंतिम दम तक मौन 
आत्म-दीप प्रज्वलित बन मोती, जीवन सीप 
*
परोपकार 
अपना हित साधन ही माना है सबने अधिकार 
परहित हेतु बनें समिधा, कब हुआ हमें स्वीकार?
स्वार्थी क्यों सुर-असुर सरीखा मानव होता आज?
नर सभ्यता सिखाती मित्रों, करना पर उपकार 
*
एकता 
तिनका-तिनका जोड़ बनाते चिड़वा-चिड़िया नीड़ 
बिना एकता मानव होता बिन अनुशासन भीड़ 
रहे-एकता अनुशासन तो सेना सज जाती है-   
देकर निज बलिदान हरे वह, जनगण कि नित पीड़
*
असली गहना 
असली गहना सत्य न भूलो 
धारण कर झट नभ को छू लो 
सत्य न संग तो सुख न मिलेगा  
भोग भोग कर व्यर्थ न फूलो 
***

vimarsh

विमर्श:
नाद छंद का मूल है

सृष्टि का मूल ही नाद है. योगी इसे अनहद नाद कहते हैं इसमें डूबकर परमात्म की प्रतीति होती है ऐसा पढ़ा-सुना है. यह नाद ही सबका मूल है.यह नाद निराकार है, इसका चित्र नहीं बन सकता़, इसे चित्रगुप्त कहा गया है. नाद ब्रम्ह की नियमित आवृत्ति ताल ब्रम्ह को जन्म देती है. नाद और ताल जनित तरंगें अनंत काल तक मिल-बिछुड़ कर भारहीन कण और फिर कई कल्पों में भारयुक्त कण को जन्म देती हैं. ऐसा ही एक कण 'बोसॉन' चर्चित हो चुका है. इन कणों के अनंत संयोगों से विविध पदार्थ और फिर जीवों का विकास होता है. नाद-ताल दोनों अक्षर ब्रम्ह है. ये निराकार जब साकार (लिपि) होते हैं तो शब्द ब्रम्ह प्रगट होता है. चित्रगुप्त के 3 रूप जन्मदाता, पालक और विनाशक तथा उनकी आदि शक्तियों (ब्रम्हा-महा शारदा, विष्णु-महालक्ष्मी, शिव-महाकाली) के माध्यम से सृष्टि-क्रम बढ़ता है. विष्णु के विविध अवतार विविध जीवों के क्रमिक विकास के परिचायक हैं. जैन तथा बौद्ध जातक कथाएँ स्पष्ट: is कहती हैं कि परब्रम्ह विविध जीवों के रूप में आता है. ध्वनि के विविध संयोजनों से लघु-दीर्घ वर्ण और वर्णों के सम्मिलन से शब्द बनते हैं. शब्दों का समुच्चय भाषा को जन्म देता है. भाषा भावों कि वाहक होती है. संवेदनाएँ और अनुभूतियाँ भाषाश्रित होकर एक से अनेक तक पहुँचती हैं. ध्वनि के लघु-गुरु उच्चारण विविध संयोजनों से विविध लयों का विकास करते हैं. इन लयों से राग बनते हैं. शब्द-संयोजन छंद को जन्म देते हैं. लय राग और छंद दोनों के मूल में होती है. लय की अभिव्यक्ति नाद से कंठ, ताल से वाद्य, शब्द से छंद , रेखाओं से चित्र तथा मुद्राओं से नृत्य करता है.सलिल-प्रवाह की कलकल, पक्षियों का कलरव भी लय की ही अभिव्यक्ति है. लय में विविध रस अन्तर्निहित होते हैं. रसों की प्रतीति भाव-अनुभाव करते हैं. लेखन, गायन तथा नर्तन तीनों ही रसहीन होकर निष्प्राण हो जाते हैं. आलाप ही नहीं विलाप में भी लय होती है. आर्तनाद में भी नाद तो निहित है न? नाद तो प्रलाप में भी होता है, भले ही वह निरर्थक प्रतीत हो. मंत्र, श्लोक और ऋचाएँ भी विविध स पड़ा हैलयों के संयोजन हैं. लय का जानकार उन्हें पढ़े तो रस-गंगा प्रवाहित होती है, मुझ जैसा नासमझ पढ़े तो नीरसता कि प्रतीति होती है. अभ्यास और साधना ही साधक को लय में लीन होने कि पात्रता और सामर्थ्य प्रदान करते हैं.

यह मेरी समझ और सोच है. हो सकता है मैं गलत हूँ. ऐसी स्थिति में जो सही हैं उनसे मार्गदर्शन अपेक्षित है.
***

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

janmdin

हास्य कविता:

जन्म दिन

*























*
पत्नी जी के जन्म दिवस पर, पति जी थे चुप-मौन.
जैसे उन्हें न मालुम है कुछ, आज पधारा कौन? 

सोचा तंग करूँ कुछ, समझीं पत्नी: 'इन्हें न याद. 
पल में मजा चखाती हूँ, भूलेंगे सारा स्वाद'..

बोलीं: 'मैके जाती हूँ मैं, लेना पका रसोई. 
बर्तन करना साफ़, लगाना झाड़ू, मदद न कोई..'

पति मुस्काते रहे, तमककर की पूरी तैयारी. 
बाहर लगीं निकलने तब पति जी की आयी बारी..

बोले: 'प्रिय! मैके जाओ तुम, मैं जाता ससुराल.
साली-सासू जी के हाथों, भोजन मिले कमाल..'

पत्नी बमकीं: 'नहीं ज़रूरत तुम्हें वहाँ जाने की. 
मुझको पता पता है, छोडो आदत भरमाने की..'

पति बोले: 'ले जाओ हथौड़ी, तोड़ो जाकर ताला.'
पत्नी गुस्साईं: 'ताला क्या अकल पे तुमने डाला?'

पति बोले : 'बेअकल तभी तो तुमको किया पसंद.'
अकलवान तुम तभी बनाया है मुझको खाविंद..''

पत्नी गुस्सा हो जैसे ही घर से बाहर  निकली. 
द्वार खड़े पीहरवालों को देख तबीयत पिघली..

लौटीं सबको ले, जो देखा तबियत थी चकराई. 
पति जी केक सजा टेबिल पर रहे परोस मिठाई..

'हम भी अगर बच्चे होते', बजा रहे थे गाना. 
मुस्काकर पत्नी से बोले: 'कैसा रहा फ़साना?' 

पत्नी झेंपीं-मुस्काईं, बोलीं: 'तुम तो मक्कार.'
पति बोले:'अपनी मलिका पर खादिम है बलिहार.' 

साली चहकीं: 'जीजी! जीजाजी ने मारा छक्का. 
पत्नी बोलीं: 'जीजा की चमची! यह तो है तुक्का..'

पति बोले: 'चल दिए जलाओ, खाओ-खिलाओ केक. 
गले मिलो मुस्काकर, आओ पास इरादा नेक..

पत्नी घुड़के: 'कैसे हो बेशर्म? न तुमको लाज.
जाने दो अम्मा को फिर मैं पहनाती हूँ ताज'.. 

पति ने जोड़े हाथ कहा:'लो पकड़ रहा मैं कान.
ग्रहण करो उपहार सुमुखी हे! रहे जान में जान..'

***
१६-१०-२०१० 
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

dohanjali

दोहांजलि
*
जयललिता-लालित्य को
भूल सकेगा कौन?
शून्य एक उपजा,
भरे कौन?
छा गया मौन.
*
जननेत्री थीं लोकप्रिय,
अभिनेत्री संपूर्ण.
जयललिता
सौन्दर्य की
मूर्ति, शिष्ट-शालीन.
*
दीन जनों को राहतें,
दीं
जन-धन से खूब
समर्थकी जयकार में
हँसीं हमेशा डूब
*
भारी रहीं विपक्ष पर,
समर्थकों की इष्ट
स्वामिभक्ति
पाली प्रबल
भोगें शेष अनिष्ट
*
कर विपदा का सामना
पाई विजय विशेष
अंकित हैं
इतिहास में
'सलिल' न संशय लेश


***

doha

दोहा सलिला-
कवि-कविता
*
जन कवि जन की बात को, करता है अभिव्यक्त
सुख-दुःख से जुड़ता रहे, शुभ में हो अनुरक्त
*
हो न लोक को पीर यह, जिस कवि का हो साध्य
घाघ-वृंद सम लोक कवि, रीति-नीति आराध्य
*
राग तजे वैराग को, भक्ति-भाव से जोड़
सूर-कबीरा भक्त कवि, दें समाज को मोड़
*
आल्हा-रासो रच किया, कलम-पराक्रम खूब
कविपुंगव बलिदान के, रंग गए थे डूब
*
जिसके मन को मोहती, थी पायल-झंकार
श्रंगारी कवि पर गया, देश-काल बलिहार
*
हँसा-हँसाकर भुलाई, जिसने युग की पीर
मंचों पर ताली मिली, वह हो गया अमीर
*
पीर-दर्द को शब्द दे, भर नयनों में नीर
जो कवि वह होता अमर, कविता बने नज़ीर
*
बच्चन, सुमन, नवीन से, कवि लूटें हर मंच
कविता-प्रस्तुति सौ टका, रही हमेशा टंच
*
महीयसी की श्रेष्ठता, निर्विवाद लें मान
प्रस्तुति गहन गंभीर थी, थीं न मंच की जान
*
काका की कविता सकी, हँसा हमें तत्काल
कथ्य-छंद की भूल पर, हुआ न किन्तु बवाल
*
समय-समय की बात है, समय-समय के लोग
सतहीपन का लग गया, मित्र आजकल रोग
*

रविवार, 4 दिसंबर 2016

muktika

कार्यशाला
मुक्तिका
दिल लगाना सीखना है आपसे
२१२२ २१२२ २१२
*
दिल लगाना सीखना है आपसे
जी चुराना सीखना है आपसे
*
वायदे को आप जुमला कह गए
आ, न आना सीखना है आपसे
*
आस मन में जगी लेकिन बैंक से
नोट लाना सीखना है आपसे
*
बस गए मन में निकलते ही नहीं
हक जमाना सीखना है आपसे
*
देशसेवा कर रहे हम भी मगर
वोट पाना सीखना है आपसे
*
सिखाने के नाम पर ले सीख खुद
गुरु बनाना सीखना है आपसे
*
ध्यान कर, कुछ ध्यान ही करना नहीं
ध्येय ध्याना सीखना है आपसे
*  
मूँद नैना, दिखा ठेंगा हँस रहे
मुँह बनाना सीखना है आपसे
*  
आह भरते देख, भरना आह फिर
आजमाना सीखना है आपसे
*****

गीत

एक रचना * आकर भी तुम आ न सके हो पाकर भी हम पा न सके हैं जाकर भी तुम जा न सके हो करें न शिकवा, हो न शिकायत * यही समय की बलिहारी है घटनाओं की अय्यारी है हिल-मिलकर हिल-मिल न सके तो किसे दोष दे, करें बगावत * अपने-सपने आते-जाते नपने खपने साथ निभाते तपने की बारी आई तो साये भी कर रहे अदावत * जो जैसा है स्वीकारो मन गीत-छंद नव आकारो मन लेना-देना रहे बराबर इतनी ही है मात्र सलाहत * हर पल, हर विचार का स्वागत भुज भेंटो जो दर पर आगत जो न मिला उसका रोना क्यों? कुछ पाया है यही गनीमत ***

आपने वोट किया है अतः आप परिणाम जानने के अधिकारी हैं

आदरणीय दोस्तो
विवेक के अभिवादन
    आप जानते हैं कि  इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के काउंसिल मेम्बर के चुनाव में  मै मित्रो के आग्रह पर आप सब के सहयोग से इस उद्देश्य से खड़ा हुआ था कि एक नई उर्जा का संचार संस्था में किया जावे तथा समाज में इंजीनियर्स को प्रतिष्ठित महत्वपूर्ण स्थान मिले तथा इंस्टीट्यूशन की गतिविधियो को समाजोन्मुख बनाया जावे . मैने पूरे इलेक्शन के निर्धारित समय काल में बार बार आप सब से ई संपर्क किया , आपके प्रत्युत्तरो से लगा कि ज्यादातर सदस्य मेरे प्रस्ताव से सहमत हैं .
    दिनांक १७ नवम्बर २०१६  को मतो की गणना की गई , मैने तब से मेल व फोन से बार बार चुनाव परिणाम जानने के लिये कलकत्ता मुख्यालय मे संबंधितो से संपर्क किया किन्तु वेबसाइट व मोबाइल के इस समय में भी इंजीनियर्स की शीर्ष संस्था जिसने देश में सर्वप्रथम ई वोटिंग की प्रक्रिया अपनाई है , ने अब तक चुनाव परिणाम गुप्त रखे हैं यह आश्चर्यकारी है , व इंगित करता है कि चुनाव प्रक्रिया में संशोधन तथा पारदर्शिता की जरूरत है . मुझे अब तक इंस्टीट्यूशन से चुनाव परिणाम के संबंध में कोई सूचना नही दी गई है . अन्य जो उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे उनमें से किसी से ज्ञात हुआ कि मेरा नाम विजयी सदस्यो में शामिल नहीं है .
        मैं हृदय से उन दोस्तो का आभार व्यक्त करना चाहता हूं जिन्होने मुझ पर विश्वास व्यक्त किया .मैं प्रतिबद्धता व्यक्त करना चाहता हूं कि फैलो सदस्य के रूप में मैं संस्था  व इंजीनियर्स की प्रतिष्ठा हेतु निरंतर कार्य करता रहूंगा , आप से निवेदन है कि इस दिशा में निसंकोच मेरे संपर्क में रहें .
यदि उचित समझें तो hcsberry@rediffmail.com अध्यक्ष बोर्ड आफ स्क्रुटिनर को लेख करते हुये प्रतिलिपि मुझे व sdg@ieindia.in को चुनावो में पारदर्शिता व गणना के तुरंत बाद चुनाव परिणाम घोषित करने व इस बार के चुनाव परिणाम जानने हेतु मेल करने का कष्ट करें .
मित्रो आपने वोट किया है अतः आप परिणाम जानने के अधिकारी हैं , मै चुनाव में उम्मीदवार था अतः मुझे कितने वोट मिले यह जानना मेरा नैसर्गिक अधिकार है . हमारी संस्था क्यो हमारे इन सहज अधिकारो का हनन कर रही है यह संदिग्ध है .

विवेक रंजन श्रीवास्तव


शनिवार, 3 दिसंबर 2016

गीत

एक रचना
*
जो पाना था,
नहीं पा सका
जो खोना था,
नहीं खो सका
हँसने की चाहत में मनुआ
कभी न खुलकर कहीं रो सका
*
लोक-लाज पग की बेड़ी बन
रही रोकती सदा रास्ता
संबंधों के अनुबंधों ने
प्रतिबंधों का दिया वास्ता
जिया औपचारिकताओं को
अपनापन ही नहीं बो सका?
जो पाना था,
नहीं पा सका
जो खोना था,
नहीं खो सका
*
जाने कब-क्यों मन ने पाली
चाहत ज्यों की त्यों रहने की?
और करी जिद अनजाने ही
नेह नर्मदा बन बहने की
नागफनी से प्रलोभनों में
फँसा, दाग कब-कभी धो सका?
जो पाना था,
नहीं पा सका
जो खोना था,
नहीं खो सका
*
कंगूरों की करी कल्पना,
नीवों की अनदेखी की है
मन-अभियंता, तन कारीगर
सुरा सफलता की चाही है
इसकी-उसकी नींद उड़ाकर
नैन मूँद कब कभी सो सका
जो पाना था,
नहीं पा सका
जो खोना था,
नहीं खो सका
*

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

samyik rachna

सामयिक रचना

चलचित्रागार में राष्ट्रगान क्यों?

राष्ट्रगीत का गान गर्व अनुभूति कराता
भारतीय हम एक हमेशा याद कराता
जन-मन-रंजन हित चलचित्र बनाये जाते
समय पूर्व हम पहुँच व्यर्थ ही समय गँवाते
राष्ट्रीय कानों में गूँजे हो सर ऊँचा
देश प्रेम गर नहीं झुकेगा मस्तक नीचा
बच्चों के कच्चे मन पर यह अंकित होगा
जो न रखेगा मान देश का दण्डित होगा
लगे कैमरे चित्र खींच लें, दोष बतायें
नागरिकों को फर्ज़ सदा हो याद कराएँ
ऊँच-नीच को मिटा करे स्थापित समता
मालिक नौकर हों न दूर, पल पाए ममता
स्त्री-पुरुष,धनी-निर्धन सब एक साथ मिल
देश गीत गुंजायें भारत मान जाए खिल
*
Sanjiv verma 'Salil', 94251 83244
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

muktak


कार्यशाला-
एक मुक्तक
*
तुम एक सुरीला मधुर गीत, मैं अनगढ़ लोकगीत सा हूँ 
तुम कुशल कलात्मक अभिव्यंजन, मैं अटपट बातचीत सा हूँ - फौजी
तुम वादों को जुमला कहतीं, मैं जी भर उन्हें निभाता हूँ
तुम नेताओं सी अदामयी, मैं निश्छल बाल मीत सा हूँ . - सलिल
****
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मंगलवार, 22 नवंबर 2016

geet

एक रचना
अनाम
*
कहाँ छिपे तुम?
कहो अनाम!
*
जग कहता तुम कण-कण में हो
सच यह है तुम क्षण-क्षण में हो
हे अनिवासी!, घट-घटवासी!!
पर्वत में तुम, तृण-तृण में हो
सम्मुख आओ
कभी हमारे
बिगड़े काम
बनाओ अकाम!
*
इसमें, उसमें, तुमको देखा
छिपे कहाँ हो, मिले न लेखा
तनिक बताओ कहाँ बनाई
तुमने कौन लक्ष्मण रेखा?
बिन मजदूरी
श्रम करते क्यों?
किंचित कर लो
कभी विराम.
*
कब तुम माँगा करते वोट?
बदला करते कैसे नोट?
खूब चढ़ोत्री चढ़ा रहे वे
जिनके धंधे-मन में खोट
मुझको निज
एजेंट बना लो
अधिक न लूँगा
तुमसे दाम.
***

chhand

रसानंद दे छंद नर्मदा ​ ​५६ :

​दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​,गीतिका,​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन / सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका, शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता / शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए​ गीता छंद ​से
गीता छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महाभागवत, प्रति पद - मात्रा २६ मात्रा, यति १४ - १२, पदांत गुरु लघु.
लक्षण छंद:
चौदह भुवन विख्यात है, कुरु क्षेत्र गीता-ज्ञान
आदित्य बारह मास नित, निष्काम करे विहान
अर्जुन सदृश जो करेगा, हरि पर अटल विश्वास
गुरु-लघु न व्यापे अंत हो, हरि-हस्त का आभास
संकेत: आदित्य = बारह
उदाहरण:
१. जीवन भवन की नीव है , विश्वास- श्रम दीवार
दृढ़ छत लगन की डालिये , रख हौसलों का द्वार
ख्वाबों की रखें खिड़कियाँ , नव कोशिशों का फर्श
सहयोग की हो छपाई , चिर उमंगों का अर्श
२. अपने वतन में हो रहा , परदेश का आभास
अपनी विरासत खो रहे , किंचित नहीं अहसास
होटल अधिक क्यों भा रहा? , घर से हुई क्यों ऊब?
सोचिए! बदलाव करिए , सुहाये घर फिर खूब
३. है क्या नियति के गर्भ में , यह कौन सकता बोल?
काल पृष्ठों पर लिखा क्या , कब कौन सकता तौल?
भाग्य में किसके बदा क्या , पढ़ कौन पाया खोल?
कर नियति की अवमानना , चुप झेल अब भूडोल।
४. है क्षितिज के उस ओर भी , सम्भावना-विस्तार
है ह्रदय के इस ओर भी , मृदु प्यार लिये बहार
है मलयजी मलय में भी , बारूद की दुर्गंध
है प्रलय की पदचाप सी , उठ रोक- बाँट सुगंध
*********

geet

एक गीत:
मत ठुकराओ
संजीव 'सलिल'
*
मत ठुकराओ तुम कूड़े को
कूड़ा खाद बना करता है.....
*
मेवा-मिष्ठानों ने तुमको
जब देखो तब ललचाया है.
सुख-सुविधाओं का हर सौदा-
मन को हरदम ही भाया है.
ऐश, खुशी, आराम मिले तो
तन नाकारा हो मरता है.
मत ठुकराओ तुम कूड़े को
कूड़ा खाद बना करता है.....
*
मेंहनत-फाके जिसके साथी,
उसके सर पर कफन लाल है.
कोशिश के हर कुरुक्षेत्र में-
श्रम आयुध है, लगन ढाल है.
स्वेद-नर्मदा में अवगाहन
जो करता है वह तरता है.
मत ठुकराओ तुम कूड़े को
कूड़ा खाद बना करता है.....
*
खाद उगाती है हरियाली.
फसलें देती माटी काली.
स्याह निशासे, तप्त दिवससे-
ऊषा-संध्या पातीं लाली.
दिनकर हो या हो रजनीचर
रश्मि-पुंज वह जो झरता है.
मत ठुकराओ तुम कूड़े को
कूड़ा खाद बना करता है.....
**********************

geet

एक गीत:
मत ठुकराओ
संजीव 'सलिल'
*
मत ठुकराओ तुम कूड़े को
कूड़ा खाद बना करता है.....
*
मेवा-मिष्ठानों ने तुमको
जब देखो तब ललचाया है.
सुख-सुविधाओं का हर सौदा-
मन को हरदम ही भाया है.
ऐश, खुशी, आराम मिले तो
तन नाकारा हो मरता है.
मत ठुकराओ तुम कूड़े को
कूड़ा खाद बना करता है.....
*
मेंहनत-फाके जिसके साथी,
उसके सर पर कफन लाल है.
कोशिश के हर कुरुक्षेत्र में-
श्रम आयुध है, लगन ढाल है.
स्वेद-नर्मदा में अवगाहन
जो करता है वह तरता है.
मत ठुकराओ तुम कूड़े को
कूड़ा खाद बना करता है.....
*
खाद उगाती है हरियाली.
फसलें देती माटी काली.
स्याह निशासे, तप्त दिवससे-
ऊषा-संध्या पातीं लाली.
दिनकर हो या हो रजनीचर
रश्मि-पुंज वह जो झरता है.
मत ठुकराओ तुम कूड़े को
कूड़ा खाद बना करता है.....
***********************